मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा की खुदाइयों से प्राप्त भग्नावशेष सिन्धु घाटी की सभ्यता

 

सिंधु घाटी सभ्यता क्या है आइए जानते हैं इसके बारे में कुछ >>>>>>






              सिन्धु घाटी की सभ्यता

      (Indus Valley Civilization)


       मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा की खुदाइयों से प्राप्त भग्नावशेष सिन्धु घाटी की सभ्यता


का ज्ञान प्राप्त कराने के महत्वपूर्ण साधन हैं। 1922 ई. में आर. डी. बनर्जी ने सिन्धु प्रान्त के 'लरकाना' जिले में मोहनजोदड़ो नामक स्थान पर एक बौद्ध स्तूप की खुदाई कराते समय बहुत से ऐसे स्मारक चिह्नों को ढूँढ़ निकाला जो किसी सभ्यता से सम्बन्धित थे । उत्खनन के इसी दौर में श्री दयाराम साहनी ने हड़प्पा का उत्खनन कराया। इन दोनों स्थानों से प्राप्त भग्नावशेषों से सिन्धु घाटी की सभ्यता प्रकाश में आयी। इससे पूर्व इस सभ्यता के विषय में लोगों को किसी भी प्रकार का ज्ञान नहीं था। इस सभ्यता की खोज पर प्रकाश डालते हुए डॉ. आर. सी मजूमदार ने लिखा है कि “सिन्धु घाटी की सभ्यता की खोज ने भारतीय इतिहास के सम्बन्ध में हमारी धारणा को ही लगभग पूर्णतया परिवर्तित कर दिया है। एक ही सफल प्रयत्न में भारतीय सभ्यता का पुरातत्व यदि अधिक नहीं तो 3000 ई. पू. तक पीछे खिंच गया है और अब मानव सभ्यता के अग्रणी के रूप में भारत की गणना सुमेर, अक्काद, बाबुल, मिस्र तथा अस्सीरिया के साथ की जाने लगी है।” चूँकि इस सभ्यता का विकास मुख्यतः सिन्धु नदी के समीपस्थ क्षेत्रों में हुआ था, अतः ह्वीलर आदि विद्वानों ने इसे  "सिंधु घाटी सभ्यता" का नाम दिया किंतु वर्तमान में इस सभ्यता को "हड़प्पा सभ्यता" के नाम से भी जाना जाता है।


सिन्धु घाटी सभ्यता की विशेषताएँ (Main Features of Indus Valley Civilization)


इस सभ्यता का विस्तार उत्तर में पंजाब के रोपड़ जिले से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी के मुहाने तक और पश्चिम में बिलोचिस्तान के मकरान तट से लेकर उत्तर-पूर्व में मेरठ तक फैला हुआ था। इस सभ्यता का क्षेत्रफल त्रिभुजाकार था। अब तक इस सभ्यता के 250 स्थानों का पता चला है, जिनमें नगरों की संख्या केवल 6 है। इस सभ्यता की विशेषताओं का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है


(1) नगर तथा भवन निर्माण। :- 

        सिन्धु घाटी की सभ्यता नगरीय सभ्यता थी। अपनी नगर योजना तक भवन निर्माण कला के लिए यह सभ्यता प्रसिद्ध थी। नगरों का निर्माण नदियों के तट पर किया जाता था। मोहनजोदड़ो तथा हडप्पा नगर से इस सभ्यता की नगर योजना पर अत्यधिक प्रकाश पड़ता है। दोनों ही नगरों का निर्माण एक सुनिश्चित योजना के आधार पर किया गया था। मोहनजोदड़ो की नगर-योजना के विषय में डॉ. ए. डी. पुसाल्कर ने लिखा है कि "मोहनजोदड़ों के खण्डहरों को देखकर कोई भी व्यक्ति प्राचीन लोगों नगर-आयोजन और सफाई के प्रबन्ध में निपुणता की प्रशंसा किये बिना नहीं रह सकता। एक अंग्रेज लेखक ने इन्हें देखकर यह कहा है कि ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह लंकाशायर में आज के किसी नगर के अवशेषों से घिरा हुआ है।"


नगर योजना की प्रमुख विशेषता सड़क निर्माण था। सड़कें नियमित रूप से पंक्तिबद्ध थीं। नगरों में सड़कों का जालसा बिछा मिला है। प्रमुख सड़कें 10 मीटर से अधिक चौड़ी होती थीं और पूर्व से पश्चिम को तथा उत्तर से दक्षिण को सरल रेखा में एक-दूसरे को समकोण पर काटती हुई जाती थीं जिनसे सम्पूर्ण नगर बड़े-बड़े आयताकार अथवा वर्गाकार खण्डों में विभाजित हो गया है। पुनः ये खण्ड छोटी-छोटी सड़कों व गलियों


द्वारा मौहल्लों में विभाजित होते थे। प्रत्येक मौहल्ला लगभग 366 मीटर लम्बा व 244 मीटर चौड़ा होता था। सड़कों की सफाई का पूर्ण प्रबन्ध था। सड़कों के किनारे स्थान-स्थान पर कूड़ेदान बने सड़कें कच्ची हुए !! प्रत्येक सड़क व गली में जगह-जगह कुएँ तथा द्वीप स्तम्भ बने हुए थे। हुआ करती थीं। सड़क के दोनों किनारों पर नीची तथा गहरी नालियाँ बनी होती थीं जो नगर के बाहर जाकर एक बड़े नाले में मिल जाती थीं। नालियों के निर्माण में ईंट, चूने तथा खड़िया मिट्टी का प्रयोग किया जाता था। वस्तुतः पानी निकासी की व्यवस्था उत्तम थी। इस सम्बन्ध में डॉ. ए. एल. वाशम

ने लिखा है कि “रोमन सभ्यता से पहले और किसी भी प्राचीन सभ्यता में पानी के निकास का इतना बढ़िया प्रबन्ध नहीं था, जितना कि सिन्धु घाटी सभ्यता में।"  सड़कों तथा गलियों के दोनों ओर भवनों का निर्माण एक पंक्ति में कच्ची तथा पक्की ईंटों के द्वारा किया जाता था। भवन में रसोईघर, स्नानघर, आँगन तथा शौचालयों का निर्माण किया जाता था। भवन छोटे-बड़े एक मंजिले तथा दो मंजिले होते थे। भवनों के द्वारा राजमार्गों की ओर न खुलकर गली में पीछे की ओर खुलते थे। भवन की दीवारों में आलमारियों का निर्माण होता था तथा शंख, हड्डी निर्मित खूँटियों को दीवार में लगाया जाता था।  उत्खनन में प्राप्त स्नानागार सिन्धु सभ्यता की मुख्य विशेषताओं में से एक है। उत्खनन में मोहनजोदड़ो से सर्वाधिक विशाल सार्वजनिक स्नानागार प्राप्त हुआ है। पक्की ईंटों से निर्मित इस स्नानागार की लम्बाई 39 फीट, चौड़ाई 23 फीट तथा गहराई 8 फीट है। इसके चारों ओर बरामदे, स्नान हेतु चबूतरे तथा अन्दर पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ हैं।      स्नानागार की बाहरी दीवार पर 'गिरिपुष्पक' का एक इंच मोटा प्लास्टर था। स्नानागार के ऊपर निर्मित कमरों में सम्भवतः पुजारी निवास करते थे, जो विशेष पर्वों पर स्नान हेतु नीचे आते थे।    मोहनजोदड़ो के अन्नागार 45-71 मीटर लम्बा तथा 15-23 मीटर चौड़ा है। हड़प्पा के दुर्ग में 6 अन्य अन्नागार मिले हैं जो कि 15-23x 6-09 मीटर आकार के हैं। इसके दक्षिण में अनाज साफ करने हेतु ईंटों के गोलाकार चबूतरे बने हुए    जल प्राप्त करने के लिए कुओं की उचित व्यवस्था की गयी थी। कुओं का निर्माण प्रत्येक भवन में इस प्रकार किया जाता था कि वे मकान के अन्दर और बाहर दोनों ओर से काम आ सकते थे। कुएँ प्रायः अण्डाकार होते थे। कुछ कुएँ गोलाकार भी होते थे। सुरक्षा के लिए इनके मुँह के चारों ओर दीवार बनायी जाती थी। कुछ कुओं के भीतर सीढ़ियाँ भी होती थी।    मोहनजोदड़ो में बड़ी-बड़ी सड़कों के किनारे से प्राप्त अवशेषों से ज्ञात होता है कि यहाँ सार्वजनिक भोजनालय भी अस्तित्व में रहे होंगे।                             





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