प्रथम विश्व युद्ध के कारणों का वर्णन कीजिए

 

   प्रथम विश्व युद्ध के कारणों का वर्णन कीजिए

                         प्रथम विश्व युद्ध


    यूरोप में सन 1914 ई. को युद्ध  बड़ाने भीषण हुआ । इसके पूर्व वीरों के विभिन्न राज्यों में अनेक युद्ध हुए , किंतु इस युद्ध में विभिन्न राष्ट्रों के मध्य जो युद्ध हुए हुए विश्व के विभिन्न स्थानों पर विभिन्न समय पर हुए , यह युद्ध सन 1914 ई. से सन 1918 ई. तक चलता रहा । लाखों व्यक्ति इस युद्ध में हताहत हुए और इस युद्ध का प्रभाव समस्त संसार पर किसी ना किसी रूप में अवश्य पडा



             प्रथम विश्व युद्ध के कारण 

 प्रथम विश्वयुद्ध राष्ट्रीय , आर्थिक और समाजवादी तथा अनेक कारणों से हुआ । बाल्कन  राज्य सर्बिया   में ऑस्ट्रिया के राजकुमार फर्डिनेंड की हत्या की घटना से युद्ध का आरंभ हुआ , परंतु प्रथम महायुद्ध के कारणों का निर्माण बहुत पहले से हो रहा था जिसका विवेचन निम्नलिखित है-----


     1) उग्र राष्ट्रीय भावना .......

              प्रथम विश्वयुद्ध का कारण उग्र राष्ट्रीयता की भावना थी । यूरोप के अन्य राज्यों में राष्ट्रीय भावना उभरकर सामने आयी । इसी भावना के कारण फ्रांस जर्मनी से अपने खोए हुए प्रांतों की वापसी चाहता था । राष्ट्रीयता के कारण बाल्कन राज्यों में अशांति फैली । राष्ट्रीयता के कारण ऑस्ट्रिया और सर्बिया में शत्रुता बढ़ गई । उग्र राष्ट्रीय भावना के कारण जर्मनी और इंग्लैंड में संबंध खराब हो गए ।

    2) उग्र सैनिक वाद की भावना का उदय .....

                 यूरोप में इस काल में उग्र सैनिक वाद की भावना बढ़ी । सभी देशों ने सीमा पर किया जाने वाला खर्चा तेजी से बढ़ा दिया , ताकि वे सैनिक शक्ति बढ़ा सके और अच्छे उपकरण प्राप्त कर सके । जर्मनी सबसे आगे था और फ्रांस और रूस उससे पीछे था । ऑस्ट्रिया अपनी ताकत घरेलू उलझन ओं के कारण नहीं बड़ा सका । ब्रिटेन ने जर्मनी के कारण अपनी जल सेना पर खर्चा बढ़ा दिया । पड़ोसी देश उस पर हमला ना कर दें इस डर से उन्होंने अपना खर्चा बढ़ा दिया तथा अनिवार्य सेना रखी ।इस प्रकार वे राष्ट्रीय सुरक्षा प्राप्त करने के लिए शांति के लिए खतरा बढ़ा रही थी ।

     परंतु जी सैन्यीकरण से एक देश की सुरक्षा का प्रबंध किया जाता था , उसी से पड़ोसी देश में असुरक्षा की भावना बढ़ जाती थी । इस प्रकार सैन्यीकरण से सुरक्षा की भावना को बढ़ावा मिला , लेकिन बदले में भय की भावना को बढ़ावा मिला , ऐसी बहुत सी पुस्तकें लिखी गई जिनमें युद्ध की महिमा का गुणगान किया गया । यूरोप के लोग इन पुस्तकों को रुचि से पढ़ते थे । यूरोप में ऐसे भी देश थे जिन्होंने सैन्यीकरण तेजी से किया । फिर यूरोप में ऐसे समूह थे जो युद्ध के खतरों से सरकार को अवगत कराते रहें । 

    1899 से 1907 ई. तक दो बार हेग में शांति सम्मेलन भी हुए , फिर भी सैन्यीकरण चलता रहा  हुई  ।

3)  यूरोपीय देशों का दो गुटों में बैठ जाना ......

          1914 ई. यूरोप  दो बड़े शिविरों में बट गया- त्रि - राष्ट्रीय संधि के सदस्य और त्रि - राष्ट्र सैहर्द के सदस्य । इस प्रणाली की शुरुआत 1879 ई. मैं हुई जब ऑस्ट्रिया जर्मन संधि हुई । 1882 ई. मैं इटली ने भी संधि कर ली । इससे त्रि - राष्ट्र संधि की स्थापना हुई। 

   त्रि - राष्ट्र सैहार्द के मूल में 1894 ई मे फ्रांस-- रुसी सन्धि हुई।

    बाद में आंग्ल - फ्रान्स सैहार्द तथा आंग्ल - रूस  सैहार्द की  स्थापना हुई ।

      इस प्रकार रूस , फ्रांस, इंग्लैंड का त्रि- राष्ट्र सभा 1960 ई. में बना।  

       यूरोप के बड़े देश दो विरोधी शिविरों में विभाजित हो गए और यही प्रथम विश्वयुद्ध का कारण बना ” प्रो . फे ” के शब्दों में युद्ध का महत्वपूर्ण कारण था "गुप्त संधियों की प्रणालियां जिसका विकास प्रशा और फ्रान्स के युद्ध के बाद हुआ और यूरोप धीरे धीरे 2 शिविरों में विरोधी गुटों में बट गया और उनमें एक दूसरे के प्रति संदेह बढ़ता गया और वे अपनी सेनाओं और नौसेना में वृद्धि करते रहे ”।

      4) उपनिवेश स्थापना एवं आर्थिक साम्राज्यवाद ....

      औद्योगिक क्रांति के कारण प्रत्येक राष्ट्र को कच्चा माल प्राप्त करने तथा कारखानों का बना माल बेचने के लिए बाजारों की जरूरत थी । जनसंख्या के बढ़ने के कारण नए देशों की जरूरत थी , अतः यूरोप शक्तिशाली राष्ट्र अफ्रीका एशिया और बाल्कन राज्यों में अपना अधिकारी स्थापित करने की बात सोचने लगे । यूरोपीय राज्यों में होड़ लग गई । कच्चे माल , बाजार और पूंजी के लिए विनियोग के लिए ऐसा किया गया और नए उपनिवेश को तलाश किया गया । आर्थिक साम्राज्यवाद की भावना बढ़ी और हर एक ऐसा सोचने लगा , जिससे कहीं-कहीं युद्ध भी हुए । दूसरे देश को अपने प्रभाव क्षेत्र में ले जाने का काम आर्थिक साम्राज्यवाद है । यूरोपीय देशों में तनाव की स्थिति आई। विभिन्न राज्य उपनिवेश ओं की खोज में निकले तो उन्हें संघर्ष हुआ । आर्थिक हित टकराने के कारण युद्ध की समस्या बढ़ी ।

    

         इतिहासकारों ने समाचार पत्रों तथा जनमत को भी विश्वयुद्ध के अनुकूल परिस्थितियां उत्पन्न करने के लिए उत्तरदाई ठहराया गया ।

समाचार पत्र दो देशों के मध्य मतभेद के किसी प्रश्न को चुनते और उन पर लिखते रहते जब तक कि नियमित समाचार पत्र युद्ध शुरू ना हो जाए । 

        उन दिनों शिक्षा के प्रसार के कारण लोग इन बातों में अधिक रूचि लेते थे और खासकर सरकारी गतिविधियों में । धीरे-धीरे समाचार पत्रों का महत्व बढ़ गया ।फ्रान्स की समाचार पत्र विदेश नीति पर टिप्पणी नहीं करते थे । जर्मन की समाचार पत्रों पर सरकार का नियंत्रण था । ब्रिटेन के समाचार पत्र अपनी बात कहते थे । इस प्रकार समाचार पत्रों में साधारण घटनाओं को उत्तेजित ढंग से भी प्रकाशित किया जाता था जिससे कि यूरोपीय देशों में समझौते के स्थान पर तनाव उत्पन्न हुआ । इंग्लैंड के समाचार पत्रों ने कैसर विलियम के कार्यों को ऐसा बताया कि इंग्लैंड के निवासी जर्मन वासियों को अपना शत्रु समझने लगे ।  

    6) जर्मनी का पूर्व की ओर विस्तार ........

                   जर्मनी का उद्देश्य पूर्व की ओर विस्तार करना था इसलिए सम्राट ने सुल्तान से दोस्ती की और बर्लिन बगदाद योजना बनाई , इंग्लैंड ऐसा नहीं चाहता था । इस प्रार्थना पर दोनों में तनाव और विरोध हुआ 

     7)  विलियम  द्वितीय का चरित्र .......

          जर्मन सम्राट विलियम द्वितीय जर्मनी को संसार की सबसे बड़ी शक्ति बनाना चाहता था । उसमें साम्राज्य के विस्तार की भावना का उदय हुआ । वह एक विशाल साम्राज्य की स्थापना करना चाहता था ।उसने सेना पर अधिक ध्यान दिया । उसने कील नहर को गहरा करवाया । जर्मन ने युद्धपोत तैयार करना शुरू किया ।

      8) ऑस्ट्रिया की नीति ..... 

                       ऑस्ट्रिया चाहता था कि बाल्कन प्रायद्वीप में तैर बिया को शक्तिशाली ना बनने देना चाहिए, परंतु सर्बिया हमेशा रूस की ओर देखता रहा । ऑस्ट्रिया और जर्मनी इस को सहन नहीं कर सके ।

    9) अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का अभाव .....

           यूरोपीय देश युद्ध के लिए तैयार थे यदि उनको कोई रोक सकता था तो वह ऐसी संस्था को मध्यस्थ करके उनके झगड़ों को कम करती । इस प्रकार अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की स्थापना की जरूरत थी जो झगड़ों का अंत कर सकती ।

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