आइए अरस्तु राजनीति विज्ञान का जनक है इसके बारे में कुछ जानते हैं।

 

आइए अरस्तु राजनीति विज्ञान का जनक है इसके बारे में कुछ जानते हैं।

अरस्तु को प्रथम राजनीतिक वैज्ञानिक क्यों माना गया है आइए जानते हैं





अरस्तू राजनीतिशास्त्र के जनक के रूप में 

                            अथवा


अरस्तू प्रथम वैज्ञानिक राजनीतिक विचारक के रूप में (Aristotle as the First Scientific Political Thinker)


अरस्तू को आधुनिक राजनीतिशास्त्र का जनक, प्रणेता या पितामह कहा जाता है। मैक्सी ने अरस्तू को 'प्रथम वैज्ञानिक विचारक' (First Political Scientist) कहा है यह । बातें इसलिए सही हैं कि अरस्तू ने न केवल राजनीतिशास्त्र को स्वतन्त्र विषय का रूप दिया है, वरन् अपनी अध्ययन पद्धति के द्वारा उसे वैज्ञानिक रूप भी दिया है। यद्यपि अरस्तू का गुरु प्लेटो और प्लेटो का गुरु सुकरात था, परन्तु प्लेटो व सुकरात को राजनीतिशास्त्र का जनक या वैज्ञानिक विचारक नहीं कहा जाता। कारण यह है कि उनके विचार अरस्तू की तरह व्यावहारिक और यथार्थवादी न होकर सैद्धान्तिक और कोरे आदर्शवादी हैं। प्लेटो ने सत्य के सम्बन्ध में जो धारणा बनायी, वह काल्पनिक थी, उसने उसे तथ्यों की कसौटी पर नहीं कसा। प्लेटो ने अपने काल्पनिक सत्य को स्वयंसिद्ध माना । परन्तु अरस्तू के साथ यह बात नहीं है, अरस्तू की अध्ययन पद्धति इतिहास व निरीक्षण पर आधारित थी। वह तुलनात्मक व वैज्ञानिक ढंग से अध्ययन करता था, इसीलिए वह 'प्रथम वैज्ञानिक राजनीतिक विचारक' था।


विज्ञान कल्पना पर आधारित नहीं होता। विज्ञान के अन्तर्गत परिस्थितियों का अध्ययन करके उससे सम्बन्धित तथ्य निकाले जाते हैं, फिर उनका वर्गीकरण किया जाता है, अन्त में कार्य के सम्बन्ध को लेकर सामान्य सिद्धान्तों का निर्धारण किया जाता है। यहाँ विधि वैज्ञानिक है और इसी का प्रयोग अरस्तू ने किया है। अरस्तू ने अपने समय के यूनान के 158 सविधानों का तुलनात्मक और वैज्ञानिक ढंग से अध्ययन किया। अरस्तू को अध्ययन विधि के आधार इतिहास और पर्यवेक्षण थे, जिनकी प्लेटो जे सर्वथा उपेक्षा की है। इस सम्बन्ध में अरस्तू ने लिखा है कि "हमको स्मरण रखना चाहिए कि युग-युग के अनुभव की अवहेलना करना हमारे लिए। कल्याणकारी नहीं हो सकता, यदि ये चीजें (प्लेटो के आदर्शवादी या कल्पनावादी विचार) हितकारी हैं तो ये छली पीढ़ी में अज्ञात नहीं रहता।"


अरस्तू के निम्नलिखित विचारों के कारण उसे प्रथम राजनीतिक वैज्ञानिक (First Political Scientist) कहा जा सकता है ------


(1) आगमन पद्धति (Inductive Method ):--

           अरस्तू की मौलिकता उसके विचारों में नहीं, वरन् उसकी अध्ययन पद्धति में है। उसने आगमन पद्धति को अपनाया है, जिसमें निरीक्षण और पर्यवेक्षण के आधार पर निष्कर्ष निकाले जाते हैं। बार्कर ने लिखा है कि “उसकी पद्धति का सार समस्त प्रासंगिक तथ्यों का पर्यवेक्षण था और उसके अध्ययन का उद्देश्य प्रत्येक मामले में, एक सामान्य सिद्धान्त की खोज करना था।"


(2) अनुभव प्रधानता (Empiricism) :--

         अरस्तू का अध्ययन और उसके निष्कर्ष अनुभव पर आधारित है। अरस्तू ने अपने आदर्श राज्य का चित्रण करने से पहले 158 संविधानों का अध्ययन किया था। इन्हीं संविधानों के आधार पर उसने अपने ग्रन्य 'पॉलिटिक्स' में विभिन्न प्रकार के संविधानों और शासन प्रणालियों का वर्णन किया है। अनुभववाद में वह मैकियावेली के नजदीक है। मैक्सलेनर ने लिखा है कि, "किसी ने यह ठीक कहा है कि प्लेटो ने अपने समकालीन एवेन्स की भ्रष्ट राजनीति से तंग आकर आदर्श राज्य का आश्रय लिया, जबकि अरस्तू, प्लेटो तथा अन्य विचारकों द्वारा चित्रित आदर्श राज्य से तंग आकर अनुभववादी पद्धति के ऊपर आधारित व्यावहारिक राजनीति की ओर झुका।"


(3) यथार्थवाद (Realism ) :– 

              अरस्तू का राजनीतिक चिन्तन तथ्यों पर आधारित है, कल्पनाओं पर नहीं। जहाँ प्लेटो का विश्वास है कि ज्ञानयुक्त व्यक्ति ही सत्य की खोज कर सकता है, वहाँ अरस्तू के लिए सत्य वास्तविक जगत से भिन्न नहीं। आदर्श का अलग से कोई रूप नहीं होता है। आदर्श की उत्पत्ति तो मौजूदा वस्तुओं से ही होती. है। इसीलिए राजनीतिशास्त्र के सिद्धान्त निर्धारित करने में अरस्तू के इतिहास के महत्त्व को (परम्पराओं व प्रथाओं) को पूर्णतया स्वीकार किया है।


 (4) तुलनात्मक पद्धति (Comparative Method) :–

        अरस्तू के लगभग 158  संविधानों का तुलनात्मक अध्ययन किया था। अरस्तू ने इन संविधानों का विस्तृत अध्ययन व विश्लेषण करने के बाद कुछ निष्कर्ष निकाले हैं। अरस्तू ने इस तुलनात्मक अध्ययन के बाद राज्य के जन्म व उसकी प्रकृति, संविधान की रचना, कानून सम्प्रभुता, क्रान्ति आदि के सम्बन्ध में जो विचार प्रस्तुत किये हैं, उन्हें ठुकराया नही जा सकता है।


(5) राजनीति और नीतिशास्त्र में पृथक्करण (Separation between Politics and Ethics) :– 

           डॉ. वी. पी. वर्मा के शब्दों में, "अरस्तू ने नीति शास्त्र और राजनीति शास्त्र पर पृथक् ग्रन्थों की रचना कर वैज्ञानिक विवेचन का मार्ग पुष्ट किया।" अरस्तू ने नीतिशास्त्र (आचारशास्त्र) को व्यक्तियों के आचरणों को नियमित करने वाले शास्त्र तक सीमित रखा तथा राजनीति को सामूहिक या सामाजिक कल्याण का साधन बताया है। वह राजनीतिशास्त्र को जीवन के सभी विज्ञानों का स्वामी बताकर इसे 'सर्वोच्च विज्ञान' (Master Science) बना दिया है।


डनिंग ने लिखा है कि “राजनीतिक सिद्धान्तों के इतिहास में अरस्तू की सबसे बड़ी महानता इस बात में निहित है कि उसने राजनीति को स्वतन्त्र विज्ञान का रूप दिया है। "


(6) सरकार के अंगों का निर्धारण (Determination of Government's Or   gans ) -----

            अरस्तू ने शासन-व्यवस्था के तीन अंगों-नीति निर्धारक, प्रशासकीय और न्यायिक का उल्लेख किया है। ये अंग आज क्रमशः व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के नाम से जाने जाते हैं। अरस्तू द्वारा इन तीनों अंगों के संगठन व कार्यों पर प्रकाश डालने का परिणाम 'शक्तिविभाजन के सिद्धान्त' और 'नियन्त्रण व सन्तुलन के सिद्धान्त' के रूप में देखने को मिला है ।


(7) लोक-कल्याणकारी राज्य की अवधारणा (Concept of Welfare State ) –

             "राज्य का जन्म जीवन के लिए हुआ है और शुभ तथा सुखी जीवन के लिए वह जीवित है। इस सिद्धान्त का प्रतिपादन अरस्तू ने किया है, जिसने आधुनिक लोक-कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को जन्म दिया है।


 (8) अरस्तू का मध्यम मार्ग (Aristotle's Golden Mean) –

            अरस्तू का मध्यम मार्ग का विचार वर्तमान राजनीति के नियन्त्रण और सन्तुलन के विचार का जनक है। अरस्तू ने प्रत्येक प्रकार की अति का विरोध किया है। कैटलिन के शब्दों में, “कन्फ्यूशियस के बाद विवेकपूर्ण दृष्टिकोण और मध्यम मार्ग का अरस्तू ही सबसे बड़ा प्रतिपाद

  (i) अरस्तू ने राज्य का पूर्ण सैद्धान्तिक वर्णन किया है। बार्कर के अनुसार, “अरस्तू के विचार (राज्य सम्बन्धी) आधुनिकतम हैं, भले ही अरस्तू का राज्य केवल एक नगर-राज्य ही रहा हो ।” अरस्तू ने ही सर्वप्रथम कहा है, “व्यक्ति एक राजनीतिक प्राणी है।”


(ii) अरस्तू ने नागरिकता की जो व्याख्या की है, वह राजनीतिशास्त्र को उसकी मौलिक तथा महत्त्वपूर्ण देन है।


(iii) अरस्तू द्वारा प्रस्तुत संविधानों का वर्गीकरण उसके वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रतीक है।


उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि अरस्तू के विचार कल्पना पर आधारित नहीं हैं, अरस्तू का दृष्टिकोण वैज्ञानिक है। अरस्तू के विचार सुस्पष्ट, तर्कसंगत और व्यवहार योग्य हैं। राजनीतिशास्त्र की वर्तमान स्वतन्त्र स्थिति अरस्तू की ही देन है। वह प्लेटो की तरह नीतिशास्त्र और राजनीतिशास्त्र को एक ही विषय नहीं मानता है। इन्हीं सब बातों के कारण 'अरस्तू राजनीतिशास्त्र का जनक' अथवा ' प्रथम राजनीतिक वैज्ञानिक है जैसे कि मैंक्सी ने कहा है।



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