रूस की 1917 ई की क्रांति के कारण का वर्णन कीजिए

 

 रूस की 1917 ई की क्रांति के कारण का वर्णन कीजिए 

  






                     क्रांति का अर्थ 

 किसी भी व्यवस्था आमूलचूल परिवर्तन क्रांति कहलाता है। किसी भी देश में होने वाली क्रांति के बीच उस देश की जनता की स्थिति और मनोदशा में निहीत रहते हैं। असंतोष को जन्म देने वाली भौतिक परिस्थितियां शांति हेतु आवश्यक पृष्ठभूमि तैयार करती है । ऐसी स्थिति में जब सरकार के लिए पुरानी लीक पर चलना कठिन हो जाता है और वह सफल सुधार योजना द्वारा समय अनुकूल नया पाठ खोजने में असमर्थ हो जाती है तो पूरे देश में क्रांति का होना स्वाभाविक हो जाता है। 

    18वीं से 20 वीं सदी तक का यूरोप का इतिहास क्रांतियों से भरा है।यूरोप के लगभग सभी देश क्रांति से  अछुते न रहे। रूस भी इसका अपवाद नहीं रहा। रूस में 1917 ई की समाजवादी क्रांति हुई जो कि यूरोप के इतिहास की ही नहीं, अपितु विश्व इतिहास की महत्वपूर्ण घटना थी । इसने रुको ही नहीं , अपितु संसार के समस्त देशों को प्रभावित किया ।

         रूसी क्रांति के दो चरण 

     1917 में रूस में दो क्रांतियां हुई । एक , ' मार्च की क्रांति ' कही जाती है और दूसरी 'नवंबर की क्रांति' , परंतु यदि यह कहा जाए कि यह दोनों प्रांतीय एक ही क्रांति के दो तार या 2 अध्याय थे तो अनुचित न होगा। वास्तव में, मार्च की क्रांति का स्वरूप राजनीतिक और नवंबर की क्रांति का स्वरूप सामाजिक था।

   रूसी क्रांति के कारण

    क्रांति एक छोटे से समय का परिणाम नहीं होती, वरन् इसके पीछे लंबे समय से चले आ रहे कुछ आधारभूत मौलिक कारण होते हैं । रूस में भी वस्तु ता क्रांति के लक्षण 1905 से ही दृष्टिगोचर हो रहे थे, किंतु जारशाही की निरंकुशता उन्हें दबाने में सफल रही। जहां एक और जार निकोलस ने प्रारंभ में शासन संबंधी सुधारों की घोषणा की और डय्मा की स्थापना का वचन देकर स्थिति को काबू में रखा, वहीं बाद में प्रतिक्रियावादी शासन लागू कर जनता को घोषित कर दिया। समय आने पर यह क्रोध 1917 की महान क्रांति के रूप में प्रकट हुआ ,जिसने रूस ही नहीं संपूर्ण विश्व हुआ को अग्नि ज्वाला से प्रभावित किया। संक्षेप में रूसी क्रांति के निम्न कारण थे



1) निरंकुश राजतंत्र  .........

                                  रूठ के शासक जार निरंकुशता के पक्षपाती थे।वे दैवीय अधिकार के सिद्धांत पर विश्वास करते थे।जार एलेग्जेंडर प्रथम एवं निकोलस प्रथम ने प्रतिक्रियावादी एवं दमनकारी नीतियों का मार्ग अपनाया। जार एलेग्जेंडर व्दितीय सुधार योजना का पक्षपाती था, किंतु उसके द्वारा किए गए न्यायिक एवं स्थानीय शासन संबंधी सुधारों का सामान तो वह जमींदारों ने विरोध किया।दूसरी ओर जनता उसके द्वारा किए गए सुधारों के कारण संवैधानिक सुधारों की आशा करने लगी, किंतु जनता की आशा पर पानी फिर गया क्योंकि जार पुनः निरंकुश हो चुका था। निहिलिस्ट आंदोलन दमन कर दिया । जार निकोलस 1 की हत्या के बाद एलेग्जेंडर 3 और फिर उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र निकोलस 2 रूढ़िवादिता के कट्टर समर्थक थे,जार निकोलस 2 के समय में रूस जापान युद्ध में रूस की पराजय से जनता उखड़ चुकी थी और रूस क्रांति के दौर पर था । स्थिति पर नियंत्रण करने के लिए निकोलस ने कुछ सुधार किए, किंतु बाद में वह पुनः निरंकुश हो गया।      हेजन ने लिखा है " कई माह तक विवाद प्रकाशन फीस और भाषण की असाधारण रही जो बीच बीच में जब तक अधिकारियों द्वारा समाप्त कर दी जाती थी परंतु वह समाप्ति उसकी केवल पुनः स्थापना के लिए होती थी"।

    जारशाही की निरंकुशता इतनी बढ़ गई थी कि 1905 में परिस्थिति को संभालने के लिए जार निकोलस ने ड्यूमा की स्थापना करने की घोषणा यह कह कर कि थी कि ड्यूमा  के सदस्य जनता द्वारा चुने जाएंगे और उसी की विकृति के कानूनों का निर्माण होगा । विद्रोह के शांत हो जाने पर ड्यूमा को संसद का प्रथम सदन माना गया ।   हेजन के अनुसार , "ड्यूमा जो की विधि निर्मात्री संस्था होनी थी तथा जिसको राज्य अधिकारियों की की देखभाल का अधिकार प्राप्त होना था परंतु इसके अधिवेशन आरंभ होने के पूर्व ही इसके पर काट दिये गए" । 

         साम्राज्य परिषद नामक दूसरे सदन का निर्माण किया गया । प्रथम ड्यूमा को जुलाई 1906 और द्वितीय ड्यूमा को जून 1907 में भंग कर दिया गया। मताधिकार सीमित कर दिया। निर्वाचन विधि में परिवर्तन करते हुए लगभग 130000 भूमि पतियों को अधिकांश सदस्यों के निर्वाचन का अधिकार दे दिया गया। *हेजन ने लिखा है* *अब तक प्रदान की गई संवैधानिक स्वतंत्रताओ का यह भी गंभीर अतिक्रमण था, क्योंकि इन स्वतंत्रता में इस बात का वचन दिया गया था कि ड्यूमा की सहमति के बिना निर्वाचन विधि में परिवर्तन नहीं होना चाहिए परिणाम स्वरूप तृतीय ड्यूमा में प्रतिक्रियावादी बड़े जमीदार चुने गए अत: ड्यूमा नाम मात्र की प्रतिनिधि संस्था रह गई।

    

2)कृषको की स्थिति........

                              औद्योगिक दौर में रूस यूरोप के प्रमुख राज्यों की तुलना में काफी पीछे था। रूस अभी तक कृषि प्रधान देश था, किंतु कृषि प्रधान देश होते हुए भी किसानों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। दूसरे शब्दों में, किसानों को कृषि दास की संज्ञा दी गई। उनकी स्थिति और अर्ध्ददासो कि तरह थी।किसानों पर अनेक प्रतिबंध लगे हुए थे। फलत: 1902 मे पाल्टावा और हारकोव के के कृषक विद्रोह हुए।1905 मैं किसानों ने अनेक स्थानों पर दंगे भी किए फलत: 1906 और 1910 मैं कुछ भूमि संबंधी सुधार हुए , परंतु यह भूमिहीनों की समस्या को सुलझा न सके। ड्यूमा के कैडट दल का विसम्पत्तिकरण का सुझाव शासन द्वारा अस्वीकृत कर दिया गया। लेनिन ने कृषकों को समझाया कि

 "हमें संसदीय गणतंत्र की आवश्यकता नहीं है।हमें मध्यवर्गीय जनतंत्र नहीं चाहिए।हमें मजदूरो, कृषको एवं सैनिकों के द्वारा संगठित सरकार के अतिरिक्त किसी अन्य प्रकार की सरकार नहीं चाहिए"।

   3) मजदूर वर्ग एवं पूंजीवाद ........

         जार एलेग्जेंडर के समय से रूस में औद्योगिकरण की गति तीव्र हो गई थी। औद्योगिक संस्थानों के मालिक धनाढ्य व्यक्ति थे। एक से पूंजीवाद को प्रोत्साहन मिला। 

*पूंजीवाद का मुख्य उद्देश्य 'काम अधिक वेतन कम' रहा है।* 

    अत: श्रमिक वर्ग इसे अधिक से अधिक काम लिया जाता था और कम से कम वेतन दिया जाता था। भूमिहीन किसान रोजगार की खोज में औद्योगिक संस्थानों की ओर मुड़ रहे थे। इससे पूंजीपतियों को पुनः मनमानी का अवसर प्राप्त हुआ। श्रमिक गंदी बात अंग गालियों में रहते थे। वे कोई मजदूर संघ नहीं बना सकते थे। शासन हर संभव उद्योगपतियों का साथ दे रहा था। परिणाम स्वरूप श्रमिकों पर समाजवादी सिद्धांतों का पर्याप्त प्रभाव पड़ा। श्रमिकों मुन्नी 1905 में तो सेंट पीटर्सबर्ग में श्रमिकों की सोवियत तक बना डाली। 

फिशर के अनुसार, *"साम्यवादी प्रचार ने देश के श्रमिकों में जार शाही के प्रति घोर असंतोष एवं घृणा उत्पन्न कर दी जिसके कारण लोग जार के शासन का अंत करने के लिए क्रांतिकारियों का साथ देने लगे।*

   4) अल्पसंख्यकों का विद्रोह ........

     *रूस में यहूदी, पोल, फिन और अल्पसंख्याक जातियां निवास करती थी।* 

     यह सभी जातीय रूसी साम्राज्य के अधीन की और पराधीनता का अनुभव करती थी ।जार इन जातियों का रूसी करण करना चाहता था। शिक्षा का माध्यम रूसी भाषा कर दिया गया। उच्च पदों पर रुचि नियुक्त किए गए । रूसी प्रशासन ने अल्पसंख्यक जातियों की राष्ट्रीय भावनाओं का दमन करने का प्रयत्न किया। यहूदियो व आर्मेनियनो पर विशन अत्याचार किए गए । 1905 में जार्जिया, पोलैंड और वॉल्टिक प्रांतों में विद्रोह हुए। इन्हे जिस तरह कुचला गया, यह सभी निरंकुश शासन के अंत करने के पक्षपाती हो गए।

    5) प्रबुद्ध वर्ग का प्रभाव ......

    *टालस्टाय, वास्तोविस्की,तुर्गनेव,मैक्जिम गोर्की,मार्क्स और बाकुनिन के विचारो ने रुसी जनता कि आत्यधिक प्रभावित किया।*  

इनके विचारों ने रूसी जनता में बौद्धिक विप्लव पैदा कर दिया और रूसी जनता समाजवादी विचारों से प्रभावित हुई। वह निरंकुशता की समाप्ति चाहने लगी। जार ने साम्यवदी विचारों के देश में आगमन पर प्रतिबंध लगाने का प्रयत्न किया, किंतु उसे सफलता प्राप्त न हो सकी।

    6) यूरोपीय लोकतंत्र का प्रभाव.....

 प्रथम विश्वयुद्ध में रूस इंग्लैंड तथा फ्रांस की ओर से लड़ा। 

*इंग्लैंड और फ्रांस का युद्ध का नारा राष्ट्रीयता, स्वतंत्रता एवं लोकतंत्र की रक्षा करना था।* 

वे इसी के लिए लड़ रहे थे। उनके इस प्रचार का रूस पर गहरा प्रभाव पड़ा। रूसी जनता ने देखा कि जब रूसी सेना राष्ट्रीयता स्वतंत्रता और लोकतंत्र के लिए लड़ रही है तू देश में निरंकुशता क्यों है? अत: वह देश में लोकतंत्र की स्थापना की आकांक्षा करने लगी।



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